महासमुंद : एलपीजी गैस चोरी के बड़े मामले ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को हिला दिया है। करीब 1.5 करोड़ रुपये की गैस हेराफेरी के इस केस में पुलिस की जांच लगातार नए और चौंकाने वाले खुलासे कर रही है।
पिता और बेटे की गिरफ्तारी कैसे पहुंची कोल्हापुर तक
इस मामले में लंबे समय से फरार चल रहे ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स के मालिक संतोष सिंह ठाकुर और उनके बेटे सार्थक सिंह ठाकुर को आखिरकार महाराष्ट्र के कोल्हापुर से गिरफ्तार किया गया। दोनों आरोपी लगातार अलग अलग शहरों में ठिकाने बदलकर पुलिस से बचने की कोशिश कर रहे थे।गिरफ्तारी के बाद उन्हें ट्रांजिट रिमांड पर महासमुंद लाया गया है, जहां उनसे गहन पूछताछ जारी है।
खाद्य अधिकारी पर मास्टरमाइंड का आरोप क्यों बना सबसे बड़ा मोड़
जांच में सबसे बड़ा खुलासा यह सामने आया कि खाद्य अधिकारी अजय यादव इस पूरे नेटवर्क के कथित मास्टरमाइंड थे। आरोप है कि गैस से भरे ट्रकों को सुपुर्दनामा दिलाने से लेकर फर्जी तौल पंचनामा तैयार कराने तक पूरी प्रक्रिया में उनकी भूमिका रही।यह भी सामने आया है कि विभागीय कार्यालय में ही फर्जी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए और स्टॉक की जांच को जानबूझकर प्रभावित किया गया।
फर्जीवाड़े का पूरा नेटवर्क कैसे चलता रहा
पुलिस के अनुसार, इस पूरे खेल में गैस के स्टॉक को जल्दी खाली दिखाने और वास्तविक तौल प्रक्रिया को नजरअंदाज करने की साजिश शामिल थी। इससे बड़े पैमाने पर गैस की हेराफेरी संभव हो सकी।जांच में यह भी सामने आया कि लगभग 87 टन एलपीजी गैस के गड़बड़ी के संकेत मिले हैं, जबकि कागजों में अलग आंकड़े दिखाए गए।
आरोपियों की लोकेशन ट्रैकिंग कैसे बनी गिरफ्तारी की कुंजी
पुलिस ने इस केस को सुलझाने के लिए तकनीकी जांच का सहारा लिया। टावर डंप डेटा, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, टोल प्लाजा की जानकारी और सोशल मीडिया गतिविधियों के जरिए आरोपियों की लोकेशन ट्रैक की गई।इस दौरान यह पता चला कि दोनों आरोपी रायपुर, पुणे, मुंबई और कोल्हापुर जैसे कई शहरों में लगातार अपनी लोकेशन बदलते रहे।
कोल्हापुर होटल से कैसे हुई अंतिम गिरफ्तारी
अंतिम सूचना के आधार पर पुलिस ने कोल्हापुर के एक होटल में दबिश दी, जहां पिता और पुत्र दोनों को पकड़ लिया गया। इस कार्रवाई में महाराष्ट्र पुलिस की भी मदद ली गई।
जांच के बाद अब किन सवालों के जवाब बाकी हैं
पुलिस के अनुसार, अप्रैल महीने में रिकॉर्ड में 40 टन गैस की खरीद दिखाई गई, जबकि बिक्री 135 टन तक दर्ज मिली। यह अंतर पूरे मामले को और गंभीर बनाता है।अब जांच इस दिशा में केंद्रित है कि इस नेटवर्क में और कौन लोग शामिल थे और इस हेराफेरी का अंतिम लाभ किसे पहुंचा।
