श्रमिक दिवस पर बोरे बासी राजनीति गरमाई, छत्तीसगढ़ में बयानबाजी से बढ़ा सियासी तापमान

3 Min Read

छत्तीसगढ़ : पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 1 मई अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस के अवसर पर दुर्ग स्थित राजीव भवन में कांग्रेस नेताओं के साथ पारंपरिक व्यंजन बोरे बासी खाकर इस दिन को मनाया। इस दौरान उन्होंने इसे श्रमिक और किसान वर्ग के जीवन से जुड़ा महत्वपूर्ण भोजन बताया।

बोरे बासी को बताया स्वास्थ्यवर्धक, परंपरा को पहचान दिलाने का दावा
भूपेश बघेल ने कहा कि बोरे बासी छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति और मजदूर जीवन का अहम हिस्सा है। उन्होंने इसे गर्मी के मौसम में लाभकारी और पोषक तत्वों से भरपूर बताते हुए कहा कि इसमें विटामिन और ऊर्जा देने वाले तत्व मौजूद होते हैं। साथ ही उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार के दौरान इसे बोरे बासी दिवस के रूप में पहचान दी गई थी।

सरकार पर निशाना, सुशासन तिहार को बताया केवल नाम बदलने की प्रक्रिया
पूर्व मुख्यमंत्री ने वर्तमान सरकार के कार्यक्रमों पर सवाल उठाते हुए कहा कि सुशासन तिहार जैसे आयोजन केवल नाम बदलकर किए जा रहे हैं, जबकि जमीनी स्तर पर काम की कमी है। उन्होंने बिजली तिहार और चावल त्योहार जैसे आयोजनों को भी दिखावटी करार दिया।

मिट्टी के बर्तन पर सियासी विवाद, भाजपा ने उठाए सवाल
इस आयोजन में मिट्टी के बर्तन के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। भाजपा नेताओं ने इस पर आपत्ति जताते हुए सवाल उठाए हैं कि सार्वजनिक कार्यक्रम में इस तरह के प्रतीकात्मक प्रयोग का क्या संदेश दिया जा रहा है।

शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव का तीखा हमला, प्रोपेगेंडा का आरोप
छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने इस पूरे आयोजन पर कड़ा बयान देते हुए इसे प्रोपेगेंडा बताया है। उन्होंने कहा कि मिट्टी के बर्तन का उपयोग आमतौर पर पिंडदान और पितृ भोज जैसे अवसरों पर किया जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस तरह के आयोजन से किसी विशेष संदेश को आगे बढ़ाया जा रहा है।

कांग्रेस और भाजपा के बीच बढ़ी सियासी बयानबाजी
इस पूरे मामले के बाद राज्य की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है। एक तरफ कांग्रेस इसे सांस्कृतिक पहचान और श्रमिक सम्मान से जोड़ रही है, वहीं भाजपा इसे राजनीतिक प्रदर्शन और प्रचार का हिस्सा बता रही है।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति बनाम राजनीति, मुद्दा बना बोरे बासी
बोरे बासी जैसे पारंपरिक भोजन को लेकर शुरू हुआ यह कार्यक्रम अब सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। इससे साफ है कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में परंपरा और प्रतीक भी अब चर्चा का केंद्र बनते जा रहे हैं।

Share this Article