बिलासपुर : तखतपुर विकासखंड में स्वास्थ्य विभाग और चिरायु टीम की सतर्कता ने एक छह वर्षीय बच्चे को नया जीवन देने का काम किया है। उसलापुर निवासी रामायण निर्मलकर के पुत्र टोकेश्वर निर्मलकर की गंभीर बीमारी का पता राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान चला।जांच में चिकित्सकों ने पाया कि टोकेश्वर जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित है। उसकी स्थिति बेहद गंभीर थी और समय पर उपचार नहीं मिलने पर जान का खतरा बढ़ सकता था।
बिलासपुर से हैदराबाद तक चला इलाज का सफर
प्राथमिक जांच के बाद बच्चे को जिला अस्पताल बिलासपुर भेजा गया। वहां से उसे रायपुर स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर स्मृति चिकित्सालय (मेकाहारा) रेफर किया गया। विशेषज्ञों की जांच में स्पष्ट हुआ कि जटिल हृदय रोग का उपचार राज्य के बाहर किसी सुपर स्पेशियलिटी कार्डियक सेंटर में ही संभव है।
इसके बाद टोकेश्वर को हैदराबाद के केयर हॉस्पिटल भेजा गया, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों ने ओपन हार्ट सर्जरी को उसकी जान बचाने का एकमात्र विकल्प बताया।
7 लाख रुपये का खर्च बना चुनौती, सरकार ने संभाली जिम्मेदारी
बच्चे के इलाज पर करीब 7 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान था, जिसे परिवार वहन करने की स्थिति में नहीं था। ऐसे में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. शुभा गढ़ेवाल के मार्गदर्शन में आवश्यक प्रक्रियाएं तेजी से पूरी की गईं।राज्य नोडल एजेंसी ने उपचार के लिए 7 लाख रुपये की स्वीकृति प्रदान की और राशि सीधे अस्पताल को उपलब्ध कराई गई, जिससे परिवार पर आर्थिक बोझ नहीं पड़ा।
सफल ऑपरेशन के बाद लौटी मुस्कान
8 मई 2026 को हैदराबाद में टोकेश्वर की जटिल ओपन हार्ट सर्जरी सफलतापूर्वक की गई। कई घंटे चली इस प्रक्रिया के बाद उसकी सेहत में लगातार सुधार होता गया। उपचार के बाद 29 मई को उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
वर्तमान में टोकेश्वर पूरी तरह स्वस्थ है और सामान्य जीवन जी रहा है।
चिरायु टीम कर रही लगातार निगरानी
इलाज पूरा होने के बाद भी चिरायु टीम बच्चे की नियमित निगरानी कर रही है। स्वास्थ्यकर्मी समय-समय पर उसके घर पहुंचकर स्वास्थ्य परीक्षण और फॉलोअप कर रहे हैं, ताकि भविष्य में किसी भी समस्या का समय रहते समाधान किया जा सके।
सरकारी योजनाओं की सफलता का उदाहरण
कलेक्टर संजय अग्रवाल ने इस उपलब्धि पर चिरायु टीम और स्वास्थ्य विभाग की सराहना करते हुए कहा कि सरकारी योजनाओं का वास्तविक उद्देश्य जरूरतमंद लोगों तक समय पर और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना है।वहीं बच्चे के परिजनों ने भावुक होकर कहा कि यदि बीमारी की समय पर पहचान नहीं होती और सरकारी सहायता नहीं मिलती, तो उनके बेटे को बचा पाना संभव नहीं था।
स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनशीलता का प्रेरक उदाहरण
टोकेश्वर की कहानी यह साबित करती है कि समय पर जांच, बेहतर समन्वय और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन किसी परिवार के लिए उम्मीद की नई किरण बन सकता है। यह मामला स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और संवेदनशील प्रशासनिक व्यवस्था का एक प्रेरक उदाहरण बनकर सामने आया है।
