टीएमसी में बड़ा सियासी भूचाल! ममता–अभिषेक गुट पर बगावत गहराई, 19 सांसदों के पत्र से मचा सियासी तूफान

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कोलकाता/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर जारी अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सामने आ गई है। पहले विधानसभा में विधायकों की नाराजगी और अब लोकसभा में सांसदों की बगावत ने पार्टी नेतृत्व को गहरे संकट में डाल दिया है। 19 बागी सांसदों के पत्र ने राजनीतिक हलकों में हलचल तेज कर दी है।

80 में से 58 विधायकों के बाद सांसदों की बगावत से बढ़ी मुश्किलें

जानकारी के अनुसार, विधानसभा के 80 में से 58 विधायकों की नाराजगी के बाद अब लोकसभा में भी 19 सांसदों ने अलग गुट बनाने की मांग करते हुए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा है। इस घटनाक्रम को टीएमसी के भीतर अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक असंतोष माना जा रहा है।

सायोनी घोष का नाम बना सबसे बड़ा राजनीतिक सरप्राइज

इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा चर्चा सयोनी घोष के नाम को लेकर हो रही है। वे लंबे समय से अभिषेक बनर्जी की करीबी और युवा संगठन से जुड़ी प्रमुख चेहरा मानी जाती रही हैं। ऐसे में बागी सांसदों की सूची में उनका नाम शामिल होना पार्टी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह घटनाक्रम टीएमसी के अंदर शक्ति संतुलन में बड़े बदलाव का संकेत हो सकता है।

अभिषेक बनर्जी के करीबी से बागी खेमे तक का सफर

सूत्रों के अनुसार, सयोनी घोष को पहले अभिषेक बनर्जी के युवा संगठन में अहम जिम्मेदारी मिली हुई थी और कई अभियानों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई थी। इसी वजह से उनका रुख बदलना पार्टी के भीतर चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है।

‘2029 में ममता को पीएम बनाना है’ से बदलती सियासत

कुछ समय पहले सयोनी घोष ने सार्वजनिक मंचों पर कहा था कि ममता बनर्जी को 2029 में प्रधानमंत्री बनाना उनका लक्ष्य है। लेकिन अब उनके बागी खेमे में शामिल होने को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।

दो-तिहाई सांसदों के समर्थन का दावा

बागी सांसदों का दावा है कि लोकसभा में उनके साथ पार्टी के दो-तिहाई से अधिक सांसद हैं। अगर यह दावा सही साबित होता है, तो यह टीएमसी के संसदीय दल में बड़ी टूट का संकेत होगा।

सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से अलग गुट को मान्यता देने की भी मांग की है, जिस पर अब संसदीय प्रक्रिया के तहत निर्णय लिया जाएगा।

टीएमसी के लिए बड़ा राजनीतिक मोड़

इस पूरे घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। पार्टी नेतृत्व के लिए यह न केवल संगठनात्मक चुनौती है, बल्कि आने वाले समय में राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।

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