रील्स की लत छुड़ाने की दिशा में बिलासपुर के आयुर्वेद महाविद्यालय का शोध, 60 दिन में घटा स्क्रीन टाइम

admin  - News & Entertainment
3 Min Read

बिलासपुर, छत्तीसगढ़: मोबाइल पर लगातार रील्स देखना और घंटों स्क्रीन से चिपके रहना युवाओं की दिनचर्या और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए बिलासपुर के शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय में किया गया एक शोध चर्चा में है। शोध में परामर्श, योग और जीवनशैली में बदलाव के जरिए डिजिटल इस्तेमाल की आदतों में सुधार दर्ज किया गया।

केंद्रीय आयुष मंत्रालय के अधीन केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद की विद्यार्थी शोध योजना में बीएएमएस की छात्रा कीर्ति यदु की परियोजना को सर्वोच्च उत्कृष्ट श्रेणी मिली है। यह शोध रोग निदान एवं विकृति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. अमित नामपल्लीवार के मार्गदर्शन में किया गया।

60 दिन तक चला अध्ययन

शोध के लिए महाविद्यालय के 200 विद्यार्थियों की जांच की गई। इनमें से मानसिक समायोजन संबंधी लक्षणों वाले 35 विद्यार्थियों को 60 दिन के अध्ययन में शामिल किया गया। प्रतिभागियों में 73 प्रतिशत छात्राएं थीं।

अध्ययन के दौरान विद्यार्थियों को दवाएं नहीं दी गईं। इसके बजाय आयुर्वेद की सत्वावजया चिकित्सा और आधुनिक तार्किक-भावनात्मक व्यवहार चिकित्सा के सिद्धांतों पर आधारित परामर्श दिया गया। हर 15 दिन में आयोजित सत्रों के साथ विद्यार्थियों को डिजिटल उपवास, उपकरणों से मुक्त शयनकक्ष, भ्रामरी प्राणायाम, योग निद्रा और नियमित दिनचर्या अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।

स्क्रीन टाइम और अवसाद मापांक में कमी

शोध रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिभागियों का औसत दैनिक स्क्रीन टाइम 5.63 घंटे से घटकर 3.48 घंटे रह गया। वहीं, अवसाद मापांक का औसत स्तर 15.93 से घटकर 7.5 दर्ज किया गया।

शोध में आयुर्वेद के ‘प्रज्ञापराध’ सिद्धांत के जरिए डिजिटल लत को समझने का प्रयास किया गया। इस सिद्धांत के अनुसार, हानिकारक परिणामों की जानकारी होने के बावजूद किसी व्यवहार को दोहराते रहना बौद्धिक निर्णय और आत्मसंयम से जुड़ी समस्या हो सकती है।

हालांकि, अध्ययन में केवल 35 विद्यार्थी शामिल थे। इसलिए इन नतीजों को सभी युवाओं पर लागू नहीं किया जा सकता। बड़े समूह के साथ आगे के शोध से यह समझने में मदद मिल सकती है कि परामर्श और जीवनशैली में बदलाव कितने प्रभावी हैं।

इस अध्ययन से डिजिटल आदतों में सुधार के लिए दवा के बजाय व्यवहार, दिनचर्या और मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित उपायों की संभावनाएं सामने आई हैं।

Share this Article