Madhya Pradesh : नौतपा के दौरान मौसम ने अचानक करवट ले ली है। कई जिलों में तेज आंधी, बारिश और ओलावृष्टि ने एक ओर लोगों को गर्मी से राहत दी, वहीं दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में भारी नुकसान की स्थिति भी बन गई है। भिंड, दमोह और मुरैना जैसे जिलों में बारिश के साथ तेज हवाओं ने जनजीवन प्रभावित किया है।
तापमान में बड़ी गिरावट, कई शहरों में पारा 40 डिग्री से नीचे
लंबे समय से भीषण गर्मी और हीटवेव झेल रहे लोगों को राहत मिली है। प्रदेश के कई हिस्सों में तापमान में करीब 10 डिग्री सेल्सियस तक की गिरावट दर्ज की गई है। खजुराहो और नौगांव जैसे सबसे गर्म रहने वाले क्षेत्रों में भी तापमान 40 डिग्री से नीचे पहुंच गया है।
प्री-मानसून के संकेत, लेकिन मानसून को लेकर चिंता भी बढ़ी
मौसम में आए इस बदलाव को प्री-मानसून गतिविधि माना जा रहा है। हालांकि मौसम वैज्ञानिकों ने संकेत दिया है कि इस बार मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है, जिससे खेती-किसानी पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
कम बारिश का अनुमान, 47 जिलों में सूखे जैसे हालात का खतरा
वैज्ञानिकों के अनुसार इस वर्ष मध्य प्रदेश में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। जहां सामान्यतः 37 इंच से अधिक वर्षा होती है, वहीं इस बार यह आंकड़ा 30 से 32 इंच तक सीमित रह सकता है। अनुमान है कि लगभग 47 जिलों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज होगी, जिससे कृषि उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
कुछ जिलों को राहत, सीमित क्षेत्रों में सामान्य बारिश की उम्मीद
ग्वालियर, भिंड, नीमच, दमोह, अनूपपुर, उज्जैन, अलीराजपुर और बड़वानी जैसे कुछ जिलों में सामान्य बारिश की संभावना जताई गई है। जबकि बाकी अधिकांश क्षेत्रों में कम वर्षा का खतरा बना हुआ है।
मानसून में देरी, जून में कमजोर बारिश का अनुमान
मौसम विभाग के अनुसार मानसून इस बार केरल तट पर देरी से पहुंचेगा और फिर देशभर में आगे बढ़ेगा। मध्य प्रदेश में आमतौर पर मानसून 10 से 15 जून के बीच पहुंचता है, लेकिन इस बार इसके 18 से 20 जून के आसपास आने की संभावना है। जून में कमजोर बारिश और जुलाई में बेहतर स्थिति बनने का अनुमान जताया जा रहा है।
अल नीनो का असर और किसानों की बढ़ती चिंता
प्रशांत महासागर में अल नीनो प्रभाव के कारण भी बारिश प्रभावित होने की आशंका है। इससे किसानों की चिंता बढ़ गई है क्योंकि कमजोर मानसून फसलों को नुकसान पहुंचा सकता है और सूखे जैसी स्थिति का खतरा पैदा हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति कृषि व्यवस्था के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है।
