भोपाल। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले से एक ऐसी परंपरा की वापसी हुई है, जिसने पूरे इलाके का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। बेगमगंज के ग्राम चांदबड़ में करीब 40 साल बाद फिर से ‘झिरआई फाग’ प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। यह सिर्फ एक पारंपरिक खेल नहीं, बल्कि साहस, संतुलन और हिम्मत की ऐसी परीक्षा है, जिसे देखकर लोग दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो गए।
ढोल-मृदंग की गूंज के बीच जुटा गांवों का जनसैलाब
चांदबड़ गांव में जैसे ही कार्यक्रम शुरू हुआ, पूरा माहौल लोक संस्कृति के रंग में रंग गया। ढोलक, मृदंग और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों के बीच सैकड़ों लोग इस ऐतिहासिक आयोजन के गवाह बने। आसपास के करीब 25 गांवों की टोलियां यहां पहुंचीं। इस लुप्त होती परंपरा को दोबारा शुरू कराने में वीर नारायण पटेल की अहम भूमिका रही।
50 फीट ऊंचा चिकना खंभा बना सबसे बड़ी चुनौती
प्रतियोगिता का सबसे रोमांचक हिस्सा मैदान के बीच लगाया गया 50 से 60 फीट ऊंचा लकड़ी का खंभा था। इस खंभे पर गेरू और खाद्य तेल लगाया गया था, ताकि वह इतना फिसलन भरा हो जाए कि उस पर चढ़ना लगभग असंभव लगे।
लेकिन असली चुनौती सिर्फ खंभा नहीं था। नीचे लाठियां लेकर खड़ी महिलाओं की टोलियां प्रतियोगियों के रास्ते की सबसे बड़ी परीक्षा बन गईं। जैसे ही प्रतियोगिता शुरू हुई, मैदान में रोमांच चरम पर पहुंच गया।
लाठियों के वार के बीच चलता रहा संघर्ष
प्रतियोगी अपने बचाव के लिए ‘T’ आकार की लकड़ी लेकर आगे बढ़ रहे थे, जबकि महिलाएं लगातार उन पर लाठियों से प्रहार कर रही थीं। कई प्रतिभागी चोटिल भी हुए, लेकिन परंपरा और उत्साह के सामने दर्द भी छोटा नजर आया।
करीब दो घंटे तक संघर्ष चलता रहा और हर कोई उस पल का इंतजार करता रहा, जब कोई प्रतियोगी खंभे की चोटी तक पहुंच पाएगा।
19 साल के निखिल ने कर दिखाया कमाल
इसी बीच मैदान में उतरे 19 वर्षीय Nikhil Raikwar। लाठियों की मार, फिसलन और लगातार मुश्किलों के बावजूद निखिल पीछे नहीं हटे। उन्होंने धीरे-धीरे खंभे पर चढ़ाई जारी रखी और आखिरकार 50 फीट ऊंचे स्तंभ की चोटी तक पहुंच गए।
निखिल ने वहां बंधी धर्म ध्वजा और प्रसाद की पोटली को तोड़ते ही पूरा गांव तालियों और जयकारों से गूंज उठा। यह नजारा लोगों के लिए किसी जीत के उत्सव से कम नहीं था।
बहादुरी के लिए मिला सम्मान और इनाम
कार्यक्रम में मौजूद क्षेत्रीय विधायक Devendra Patel ने मंच पर बुलाकर निखिल रैकवार का सम्मान किया। उन्हें तिलक लगाकर पुष्पमाला पहनाई गई और 21 हजार रुपए का नगद पुरस्कार देकर उनकी बहादुरी को सलाम किया गया।
परंपरा के साथ जुड़ा है साहस और लोक संस्कृति का अनोखा संगम
‘झिरआई फाग’ सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि ग्रामीण लोक संस्कृति और सामूहिक उत्साह की पहचान माना जाता है। वर्षों बाद इसकी वापसी ने इलाके में नई ऊर्जा भर दी है और अब लोग चाहते हैं कि यह परंपरा आने वाले समय में भी लगातार जीवित रहे।
