Iran US War: हाल ही में ईरान से आ रहे एक कच्चे तेल के जहाज ने अपने मार्ग में बदलाव किया, जिससे वह भारत की बजाय चीन की तरफ बढ़ गया। इस घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए थे, खासकर पेमेंट और अमेरिका के प्रतिबंधों को लेकर। हालांकि, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने इसे सामान्य व्यापारिक प्रक्रिया बताया है।
जहाज का मार्ग बदलना सामान्य प्रक्रिया
मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत की तरफ आ रहे तेल के शिपमेंट का चीन की ओर रुख करना किसी तरह की गड़बड़ी या भुगतान समस्या की वजह से नहीं हुआ है। अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार में जहाजों के मार्ग बदलना आम बात है।
पेट्रोलियम मंत्रालय ने बताया कि कई बार “बिल ऑफ लैडिंग” में लिखी मंज़िल केवल संकेतात्मक होती है। व्यापारिक फायदे, कीमत, मांग या लॉजिस्टिक कारणों से जहाज का रूट बदलना सामान्य है।
पिंग शुन का चीन की ओर रुख
जहाज ‘Ping Shun’, जो पहले गुजरात के वडीनार बंदरगाह आने वाला था, अब चीन के डोंगयिंग की ओर बढ़ गया है। इसके चलते अटकलें लगाई गईं कि अमेरिका के प्रतिबंध या पेमेंट की समस्या के कारण मार्ग बदला गया, लेकिन सरकार ने इसे “तथ्यात्मक रूप से गलत” बताया।
मंत्रालय ने यह भी बताया कि भारत 40 से ज्यादा देशों से तेल खरीदता है और रिफाइनर कंपनियों को अपनी व्यावसायिक जरूरतों के हिसाब से कहीं से भी तेल खरीदने की पूरी आजादी है।
भारत की तेल सप्लाई सुरक्षित
सरकार ने भरोसा दिलाया कि भारत की तेल सप्लाई पूरी तरह सुरक्षित है और आने वाले महीनों में किसी तरह की कमी नहीं होगी। कुल मिलाकर, जहाज का मार्ग बदलना असामान्य नहीं है बल्कि अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। इसका उद्देश्य व्यापार को अधिक लाभदायक बनाना और परिचालन में लचीलापन बनाए रखना है।
2019 के बाद पहली ईरानी खेप?
पिंग शुन शिपमेंट खास इसलिए चर्चा में है क्योंकि इसे 2019 के बाद भारत की पहली ईरानी कच्चे तेल की खेप माना जा रहा था। 2019 में अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों के चलते इंपोर्ट रोक दिया गया था। इस शिपमेंट में लगभग 6,00,000 बैरल तेल है, जिसे 4 मार्च के आसपास ईरान के खर्ग द्वीप से लोड किया गया और 4 अप्रैल तक भारत पहुंचना था।
