रायपुर। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए वर्षों तक गंभीर चुनौती बना नक्सलवाद अब निर्णायक अंत की दिशा में बढ़ता नजर आ रहा है। रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि यह बदलाव केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई का नतीजा नहीं, बल्कि मजबूत नीतियों, स्पष्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति और केंद्र व राज्य सरकारों के बीच बेहतर तालमेल का संयुक्त परिणाम है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह उपलब्धि एक दिन में हासिल नहीं हुई, बल्कि लंबे संघर्ष, बलिदान और निरंतर रणनीतिक प्रयासों की देन है।
लोकतंत्र के आगे बेअसर हुई बंदूक की ताकत
अग्रवाल ने कहा कि नक्सलवाद का कमजोर पड़ना इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र की सामूहिक शक्ति के सामने हिंसा और बंदूक का प्रभाव टिक नहीं सकता। उन्होंने इसे देश के लोकतांत्रिक मूल्यों की बड़ी जीत बताया।
शहीद जवानों को श्रद्धांजलि
इस अवसर पर उन्होंने केंद्रीय अर्धसैनिक बलों, कोबरा कमांडो, छत्तीसगढ़ पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों के शहीद जवानों को नमन किया। उनके अनुसार, यह सफलता उन वीर जवानों के साहस, त्याग और राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण की जीवंत मिसाल है।
नक्सलबाड़ी से रेड कॉरिडोर तक का विस्तार
भारत में नक्सल आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी, जिसकी पृष्ठभूमि उग्र वामपंथी विचारधारा रही। धीरे-धीरे यह आंदोलन देश के आदिवासी और वन क्षेत्रों में फैलता गया और ‘रेड कॉरिडोर’ के रूप में विकसित हुआ।
छत्तीसगढ़ का बड़ा वन क्षेत्र इस गतिविधि का प्रमुख केंद्र बन गया, जहां अबूझमाड़ जैसे दुर्गम इलाकों में नक्सलियों ने लंबे समय तक मजबूत पकड़ बनाए रखी।
विचारधारा से भटककर उगाही का जरिया बना आंदोलन
अग्रवाल के मुताबिक, समय के साथ नक्सलवाद अपनी मूल सोच से भटक गया और हिंसा तथा अवैध वसूली का माध्यम बनकर रह गया। बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में नक्सलियों ने भय का वातावरण तैयार कर समानांतर तंत्र स्थापित किया और खनन, तेंदूपत्ता व्यापार तथा विकास कार्यों से जुड़े लोगों से जबरन वसूली की।
नीतिगत कमजोरी से बढ़ा दायरा
उन्होंने आरोप लगाया कि पहले की सरकारों में स्पष्ट और सख्त नीति के अभाव के कारण नक्सलवाद को फैलने का अवसर मिला। यही वजह रही कि यह समस्या देश के करीब 12 राज्यों के लगभग 180 जिलों तक पहुंच गई।
राष्ट्रीय सोच से मिली निर्णायक दिशा
अग्रवाल ने अपने छात्र जीवन के अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने बस्तर में रहकर नक्सलवाद की वास्तविक स्थिति को करीब से देखा है। उनके अनुसार, इस चुनौती से निपटने के लिए केवल सैन्य कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं थी, बल्कि जनजागरण और राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत करना भी जरूरी था।
उन्होंने कहा कि 1990 के दशक में लिए गए कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई को राष्ट्रीय अखंडता के दृष्टिकोण से लड़ने की रणनीति तय की गई, जिसने आगे चलकर निर्णायक भूमिका निभाई।
