1917 की वो खौफनाक रात, जब समंदर में समा गए 40 घर

admin  - News & Entertainment
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इंग्लैंड के दक्षिणी डेवोन तट पर बसे हॉल्सैंड्स गांव की कहानी इंसानी दखल और प्रकृति के बीच बिगड़े संतुलन की एक भयावह मिसाल है। कभी समुद्र की ऊंची लहरों से सुरक्षित रहने वाला यह मछुआरों का गांव 1917 में आए भीषण तूफान के दौरान तबाह हो गया। गांव की सुरक्षा करने वाला प्राकृतिक कंकड़-पत्थरों का तट बड़े पैमाने पर खनन के कारण पहले ही कमजोर हो चुका था।

कैसे शुरू हुई तबाही की कहानी?

हॉल्सैंड्स गांव में करीब 40 घर थे और लगभग 160 लोग यहां रहते थे। गांव के सामने फैला कंकड़-पत्थरों का चौड़ा तट समुद्र की शक्तिशाली लहरों से प्राकृतिक ढाल का काम करता था।

1894 में प्लायमाउथ के कीहम नौसैनिक डॉकयार्ड के विस्तार के लिए स्टार्ट बे क्षेत्र से कंकड़-पत्थर निकालने की योजना बनी। 1897 में बड़े पैमाने पर खनन शुरू हुआ। इससे समुद्र तट की प्राकृतिक सुरक्षा धीरे-धीरे कमजोर होने लगी।

ग्रामीणों की चेतावनी को नहीं मिली तवज्जो

स्थानीय लोगों ने तट के सिकुड़ने और समुद्र का पानी घरों के करीब आने को लेकर चिंता जताई। लेकिन उनकी आशंकाओं के बावजूद खनन जारी रहा। 1902 में विरोध के बाद खनन का लाइसेंस रद्द किया गया, मगर तब तक तट से बड़ी मात्रा में कंकड़-पत्थर निकाले जा चुके थे।

1917 की तूफानी रात में उजड़ गया गांव

जनवरी 1917 में आए भीषण तूफान के दौरान समुद्र की लहरों ने गांव को भारी नुकसान पहुंचाया। कई मकान ढह गए और समुद्र तट के किनारे बसा पुराना गांव लगभग पूरी तरह नष्ट हो गया। इस घटना ने दिखाया कि प्राकृतिक तटों के साथ बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ तटीय बस्तियों के लिए कितना गंभीर खतरा बन सकती है।

हॉल्सैंड्स की कहानी आज भी क्यों अहम है?

हॉल्सैंड्स की तबाही सिर्फ एक ऐतिहासिक हादसा नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिए भी एक चेतावनी है। प्राकृतिक तट, रेत और कंकड़-पत्थर समुद्र की लहरों के असर को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके संतुलन को नुकसान पहुंचने पर तटीय इलाकों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है।

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