रायपुर। छत्तीसगढ़ के उत्तरी जिलों जशपुर, बलरामपुर और सूरजपुर में जनजातीय किसान पारंपरिक खेती के साथ अब बागवानी को भी आय का प्रमुख जरिया बना रहे हैं। नाशपाती, काजू, सेब, स्ट्रॉबेरी, आम और लीची की खेती से किसानों को नए बाजार मिल रहे हैं। नाबार्ड, रीड्स और उद्यानिकी विभाग के सहयोग से उत्पादों को दूसरे राज्यों तक पहुंचाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
जशपुर में नाशपाती और काजू की खेती का विस्तार
जशपुर जिले में करीब 7,800 किसान काजू और 3,500 किसान नाशपाती की खेती से जुड़े बताए गए हैं। मनोरा और बगीचा विकासखंडों में लगभग 3,500 एकड़ में नाशपाती के बाग हैं। यहां सालाना करीब 1.75 लाख क्विंटल उत्पादन होने का अनुमान है। काजू की खेती भी कुनकुरी, दुलदुला, कांसाबेल, फरसाबहार और पत्थलगांव क्षेत्रों में फैली हुई है।
सेब और स्ट्रॉबेरी की खेती भी बढ़ी
जशपुर में वर्ष 2023 से सेब की खेती के प्रयोग शुरू हुए। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, करीब 410 किसान लगभग 410 एकड़ में सेब उगा रहे हैं। जिले में लीची और स्ट्रॉबेरी उत्पादन से जुड़े किसान भी अपनी आजीविका मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
मनोरा की महिला किसान अंजू लकड़ा ने बताया कि पिछले सीजन में उन्होंने नाशपाती से 1.20 लाख रुपये कमाए और इस साल ढाई लाख रुपये की आय की उम्मीद है।
बलरामपुर और सूरजपुर में भी बागवानी पर जोर
बलरामपुर जिले के शंकरगढ़ क्षेत्र में करीब एक हजार किसान नाशपाती की खेती कर रहे हैं। राजपुर में आम और अमरूद के बाग विकसित किए गए हैं। सूरजपुर के प्रतापपुर और प्रेमनगर क्षेत्रों में वाड़ी विकास योजना के तहत लगभग एक हजार जनजातीय परिवारों को फलदार पौधों से जोड़ने की पहल की गई है।
बागवानी के विस्तार से किसानों को पारंपरिक फसलों के अलावा अतिरिक्त आय के विकल्प मिल रहे हैं। स्थानीय फल उत्पादों को दिल्ली, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे बाजारों तक पहुंचाने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
