अमेरिका : H-1B वीजा को लेकर एक बड़ा कानूनी फैसला सामने आया है जिसने वैश्विक टेक और नौकरी बाजार को प्रभावित किया है। अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने राष्ट्रपति प्रशासन की ओर से लागू की गई 1 लाख डॉलर यानी लगभग 96 लाख रुपये की फीस व्यवस्था को रद्द कर दिया है। इस फैसले के बाद खासकर भारतीय आईटी और टेक पेशेवरों को बड़ी राहत मिली है।
कोर्ट का सख्त रुख और ट्रंप प्रशासन को झटका
अमेरिकी फेडरल जज रिचर्ड स्टर्न्स ने इस नीति को असंवैधानिक करार देते हुए इसे तुरंत प्रभाव से खत्म करने का आदेश दिया। यह नियम सितंबर 2025 के एक राष्ट्रपति आदेश के बाद लागू किया गया था, जिसे विदेश विभाग और गृह सुरक्षा विभाग ने तेजी से लागू किया था।
कोर्ट ने साफ कहा कि यह नीति शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत का उल्लंघन करती है, जिसके तहत किसी एक संस्था या राष्ट्रपति को असीमित अधिकार नहीं दिए जा सकते।
क्यों रोकी गई H-1B वीजा की 1 लाख डॉलर फीस
इस मामले में अमेरिकी चैंबर ऑफ कॉमर्स ने अदालत में याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि राष्ट्रपति को इस तरह भारी फीस लगाने का अधिकार संसद से स्पष्ट रूप से नहीं मिला है।
कोर्ट ने इन दलीलों को गंभीर मानते हुए कहा कि इतनी बड़ी फीस व्यवस्था कानूनी ढांचे से बाहर जाकर लागू की गई थी, इसलिए इसे वैध नहीं माना जा सकता।
अमेरिकी नीति पर कानूनी टकराव कैसे बना मामला
यह फैसला उस समय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब फरवरी में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक टैरिफ संबंधी निर्णय ने भी इसी तरह के मामलों पर असर डाला था। इसी कानूनी माहौल के बीच फेडरल जज ने यह कड़ा कदम उठाया और नई फीस व्यवस्था को रद्द कर दिया।
H-1B Visa क्या है और क्यों दुनिया भर में इसकी अहमियत है
H-1B वीजा एक विशेष प्रकार का वर्क वीजा है, जिसके तहत अमेरिकी कंपनियां उच्च कौशल वाले विदेशी पेशेवरों को अस्थायी रूप से नौकरी पर रख सकती हैं। इसके लिए आमतौर पर बैचलर डिग्री या उससे अधिक योग्यता आवश्यक होती है।
इस वीजा का सबसे बड़ा उद्देश्य यह है कि विदेशी प्रतिभा का उपयोग किया जाए, लेकिन शर्त यह रहती है कि इससे अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरी या वेतन पर नकारात्मक असर न पड़े।
भारतीय पेशेवरों पर क्या होगा असर
भारत से हर साल बड़ी संख्या में आईटी, इंजीनियरिंग और टेक सेक्टर के पेशेवर H-1B वीजा के जरिए अमेरिका जाते हैं। इतनी भारी फीस लागू होने पर यह प्रक्रिया लगभग असंभव हो जाती।
अब अदालत के फैसले के बाद यह रास्ता फिर से अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, जिससे भारतीय पेशेवरों और अमेरिकी कंपनियों दोनों को राहत मिलने की उम्मीद है।
