छत्तीसगढ़ सरकार अत्यावश्यक सेवाओं में बाधा रोकने के लिए कानूनी प्रावधानों को सख्त बनाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए छत्तीसगढ़ अत्यावश्यक सेवा संधारण तथा विच्छिन्नता निवारण संशोधन विधेयक, 2026 के प्रावधानों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।
रायपुर स्थित मंत्रालय महानदी भवन में बुधवार को मुख्य सचिव विकासशील की अध्यक्षता में वरिष्ठ सचिवों की उच्चस्तरीय समिति की बैठक हुई। इसमें वर्ष 1979 के अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों, अत्यावश्यक सेवाओं के दायरे और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े पहलुओं की समीक्षा की गई।
बैठक में जनसेवाओं में व्यवधान रोकने, प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत करने और अनुशासन बनाए रखने पर चर्चा हुई। मुख्य सचिव ने संबंधित विभागों को विधिक और प्रशासनिक औपचारिकताएं जल्द पूरी करने के निर्देश दिए। हालांकि, विधेयक के अंतिम स्वरूप और इसके लागू होने की स्थिति की जानकारी अभी स्पष्ट नहीं है।
पीपीपी मॉडल पर चल सकते हैं बिलासपुर के दो बड़े अस्पताल
इसी बैठक में बिलासपुर के कोनी स्थित सिम्स मेडिकल कैंपस में बने 240 बिस्तरों वाले सुपर स्पेशलिटी अस्पताल और 100 बिस्तरों वाले स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट के संचालन का प्रस्ताव भी चर्चा में आया।
प्रस्ताव के अनुसार, दोनों अस्पतालों का संचालन और रखरखाव सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत 10 साल के लिए एक निजी संस्था को सौंपने पर विचार किया जा रहा है।
प्रस्ताव में आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाओं के हितग्राहियों और निशुल्क इलाज पाने वाले मरीजों के लिए बिस्तर आरक्षित रखने की बात है। वहीं, 20 प्रतिशत बिस्तरों पर भुगतान करने वाले मरीजों का इलाज किए जाने का प्रावधान प्रस्तावित है।
सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में हृदय रोग, न्यूरोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, किडनी और मूत्र रोगों के उपचार की सुविधा उपलब्ध कराने की योजना है। दोनों प्रस्तावों पर अंतिम निर्णय और क्रियान्वयन की आधिकारिक जानकारी सामने आना बाकी है।
