जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा में विशाल विजय रथ निर्माण की महत्वपूर्ण रस्म नार फोड़नी शनिवार को सिरहासार भवन के सामने पारंपरिक विधि-विधान से संपन्न हुई। इस रस्म के पूरा होने के बाद अब आठ पहियों वाले दो मंजिला विजय रथ को अंतिम रूप देने की तैयारी तेज हो गई है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, 13 अक्टूबर से रथ परिक्रमा शुरू होगी। भीतर रैनी और बाहर रैनी इस ऐतिहासिक लोकपर्व के प्रमुख आकर्षण होंगे।
150 कारीगर तैयार कर रहे विशाल विजय रथ
बस्तर दशहरा के लिए झार उमरगांव और बेड़ा उमरगांव के करीब 150 पारंपरिक कारीगर रथ निर्माण में जुटे हैं। बढ़ई और लोहार मिलकर लकड़ी के विशाल पहियों और लोहे के कलपुर्जों को मजबूत बना रहे हैं।
नार फोड़नी रस्म के दौरान पहियों के केंद्र में विशेष प्रक्रिया से लोहे का गुर्दा लगाया जाता है। इससे पहियों को मजबूती मिलती है और भारी रथ की परिक्रमा के दौरान दबाव सहने में मदद मिलती है।
13 अक्टूबर से शुरू होगी रथ परिक्रमा
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, 13 से 18 अक्टूबर तक प्रतिदिन रथ परिक्रमा होगी। इसके बाद 21 अक्टूबर को भीतर रैनी और 22 अक्टूबर को बाहर रैनी का आयोजन प्रस्तावित है। इन रस्मों में बड़ी संख्या में स्थानीय और जनजातीय समुदायों के लोग पारंपरिक रूप से भाग लेते हैं।
भीतर रैनी के दौरान विशाल विजय रथ की विशेष परिक्रमा होती है। बाहर रैनी में रथ को वापस लाने की परंपरा निभाई जाती है। ये आयोजन बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक सहभागिता का प्रतीक हैं।
75 दिनों तक चलता है बस्तर दशहरा
बस्तर दशहरा को दुनिया के सबसे लंबे चलने वाले लोकपर्वों में गिना जाता है। यह लगभग 75 दिनों तक चलने वाला उत्सव है, जिसकी शुरुआत हरेली अमावस्या पर पाट जात्रा से होती है। इस पर्व में रावण दहन नहीं किया जाता, बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना और बस्तर की जनजातीय परंपराओं को विशेष महत्व दिया जाता है।
पाट जात्रा, डेरी गड़ाई, काछनगादी, जोगी बिठाई, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी और मुरिया दरबार जैसे पारंपरिक आयोजन इस पर्व का हिस्सा हैं। इन रस्मों के जरिए बस्तर की लोक आस्था, पारंपरिक शिल्प और सामाजिक एकजुटता की झलक देखने को मिलती है।
बस्तर दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराओं और जनजातीय विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक भी है।
